मिर्जा साहिबा
मिर्जा साहिबा पंजाबी लोकगीतों में साहिबा के उप्पर यह कलंक है उस ने अपने प्रेमी मिर्जे को अपने भाईयो हाथो ही मरवा दिया साहिबा भाईयो की बनी,वास्तव में मिर्जे का हंकारी स्वभाव था जब 70किलोमीटर तक जोड़ी भागने में कामयाब होगई तो गांव के बिलकुल नजदीक पहुंचने पर विश्राम का क्या मतलब था साहिबा ने बहुत समझाया लेकिन मिर्जा नही माना वह इस अहंकार में था की वह एक निपुण निशानेबाज है हमले पर वह उस के भाईयो को मार देगा ,डरती रब्ब रब्ब करती,साहिबा ने विश्राम के दौरान मिर्जे के सब तीर तोड़ दिए डर सही निकला भाईयो का हमला हो गया मिर्जा उठ का कमान पकड़ा तीर बेकार साहिबा भाईयो के सामने वास्ते करने लगी मेरे मिर्जे को मत मारो जब भाईयो ने नही सुनी तो तीरो की बौछार के सामने खड़ गई छलनी हो गई मिर्जे को मार दिया गया तब मिर्जे को अपने भाईयो की याद आई मैं अकेला,यह सच है एक पुत्र ना के बराबर होता है भाई ,भाई की बाजु होते हैं लेकिन मिर्जा समाज के उलट काम भी कर। रहा था उल्टा बचाव से भी बेखबर था साहिबा नही जानती थी Every thing is fair in love and war साहिबा यह भी जानती थी उस के...