Milkha Singh and inspiration






 मिल्खा सिंह और प्रेरणा


दुनिया में आना जाना बना हुआ है यह किसी को पता नहीं  आने के बाद उसे कोई ऐसा कर्म करने को मिले न मिले जिस से उस के देश की इज्जत बड़े अपनी इज्जत अपना Name and Fame के लिए हर आदमी उत्सक होता है होना भी चाहिए जहां मां बाप अमीर हो पैतृक धंधे से बच्चे पैतृक सब कुछ देखने से ही सिख जाते है कोचिग में भेजने की जरूरत नहीं होती लेकिन मिल्खा सिंह के साथ सब कुछ उल्टा हुआ 1947 के दंगो में मिल्खा सिंह के मां बाप और सात भाई बहनों को मार दिया गया जो मिल्खा सिंह ने अपनी आंखो से देखा था उस समय वह17 साल के थे लेकिन मिल्खा सिंह के पिता ने मरने से  मिल्खा सिंह को भाग मिल्खा बोला  इन शब्दों पर बाद में ;भाग मिल्खा सिंह; फिल्म भी बनी  भारत आने पर मिल्खा सिंह अनाथ हो गया रेलवे स्टेशन पर जूते आदि पॉलिश कर अपना गुजारा करने लगा कुछ दिनों बाद उसे पता चला उस की चचेरी बहन दिल्ली में है वह यहां आ गया  गरीबी के कारण यहां भी बहुत धक्के खाए  सिख समुदाय का एक ही पेशा होता था फौज में भर्ती होना आजकल इन का पेशा विदेशी बन चुका है लेकिन फौज में भी मिल्खा सिंह को भर्ती  होने में मुश्किल आ रही थी कोई कागज पत्र नही था लेकिन अनपढ़ को फौज में cook भर्ती कर लेते थे लेकिन वह भी विशेष समुदाय से था या फिर volunteer हो तो मिल्खा सिंह cook भर्ती हो गया इसे EME centre  secundrabad आंध्रप्रदेश ट्रेनिंग के लिए भेजा यहां एक सरदार cook देख साथियों को अजीब लगने लगा  एक रास्ता cook house से दुर रहने का वह था खेल कूद में हिस्सा ले मैं एक फौजी तुजरब्बा से यहां बताना चाहता हु की फौज में काफी ऐसे लोग भी होते हैं जिन का हॉबी किचन होता है कई कई महीने फौजी mess  चलाते हैं वरना अकेले cooks के लिए बड़ा मुश्किल क्यों की खाने की कभी छुट्टी नही होती लेकिन मिल्खा सिंह cook से खुश नही था उस के उस्ताद बोलते थे भाग ले नही तो रोटियां पकानी पड़ेगी लेकिन उस्ताद को क्या पता था की मिल्खा को मनाने के लिए देश के प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू भी एक दिन 1960 में पाकिस्तान में भागने के लिए request करेगे

           मोटे तौर पर देखे तो 1954 से 1964 तक 10साल का समय देश की ऑथलेटिक में मिल्खा सिंह आग के बाबुले की तरह चमका छोटे मोटे एथलेटिक के 80मेडल में 77 मेडल मिल्खा सिंह ने राष्टीय अंतरराष्ट्रीय में जीते ओलंपिक 1956,1960,1964 में मिल्खा ने हिस्सा लिया  मैडल नही जीत सका 1960 के रोम ओलंपिक  में मिल्खा चौथे नंबर पर आया लेकिन इन चारो एथलीट ने पिछले ओलंपिक 1952 का वर्ल्ड रिकॉर्ड तोड दिया  और अगले 40साल तक हिंदुस्तान से उस का रिकॉर्ड नही तोड़ सका यही सब से great inspiration है पंजाब से एक दौड़ाक ने पिछले साल दावा किया की मिल्खा सिंह का रिकॉर्ड टूट गया लेकिन इसे ओलंपिक माने या ना माने अभी साफ नही है मिल्खा सिंह के भाग्य ने एक रौचिक घटना बनाई मिल्खा वह दो विदेशी एथलीट जो फर्स्ट सेकंड आए थे उन को मिल्खा सिंह कॉमनवेल्थ वा एशियन खेलो में हरा चुका था चाहे बाद में चौथे नंबर पर रहा एक कहानी ओर 1960 में अंतरराष्ट्रीय friendly match पाकीस्तान में चल रहे थे 200 मीटर की दौड़ में    हिस्सा लेने के लिया मिल्खा सिंह को बुलाया गया लेकिन मिल्खा सिंह ने जाने से इनकार करदिया कारण दंगो की याद जो उसे हरा सकती थी लेकिन जवाहर लाल जी के मनाने से वह पहुंचे यही पर उसे उड़न सिख का खताब मिला था इस दौड़ को देखने के लिए पाकिस्तान की मुस्लिम औरते भी स्टेडियम में बैठी थी लोग बताते है उन्होंने अपने बुर्के को हटाना पड़ा इतनी स्पीड 21.23 सैकंड में दौड़ जीत लिया ,इतनी प्रस्नता हुई की जो अब्दुल खालिक पाकिस्तान का सुपर दौड़ाक था  वह हार गया पाकिस्तान के जर्नल अयूब खान ने उठ कर शाबास दी उड़न सिख का खिताब दिया इसी को को बोलते अपने पैरो पर खड़े होना मिल्खा सिंह की मृत्यु 2021 में क्रोना के कारण होगई वह 90 वर्ष के थे वास्तव में ऐसे लोग मर कर भी जीवित रहते हैं

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