Reality
See on postDevelopment तरक्की
1950 के दशक तक लगभग 90% सब कुछ कुदरत के हिसाब से था घर मिटी से उन की छत जंगल की लकड़ी से चुल्ला अनाज स्टोर मिटी से कपड़े बिस्तर आदि टांगने के लिए बांस, मंजे तख्तपोश सब जंगल की लकड़ी के घास अनाज खेती से दुध energy सब पशुओं से कारोबार पशुओं से दाल सब्जी खेतो से फ्रूट फल वृक्षों से कपड़े अपने चरखे से उन्नी वस्त्र कोटि स्वेटर आदि सब अपने हाथ से बनते थे पानी कुंए और हैंडपंप से कपड़ो की दुलाई जोहड़ से पशुओं को पानी जोहड़ से उपलब्ध होता था इसलिए लोग तंदुरुस्त थे किसी का घुटना कभी बीमार नही था शादी में सब गांव वाले मिल झूल एक दूसरे की मदद करते थे कहने का मतलब संतुष्टि थी लेकिन आज के युग में सब कुछ पैसे से है देखा देखी अधिक हो रहा है जब घर पक्के बनने शुरू हुए तब भी अदब प्रेम भाव था मिस्ट्री मजदूरों को घर से रोटी खलाई जाती थी घर के सभी मेंबर घर बनाने में अपने हाथ पैरो से संयोग करते थे अपने हाथ से घर बनाए हमेशा अपने होते हैं प्यार से भरे होते हैं धीरे धीरे घरों की जगह अभी सुंदर कोठिया बन चुकी है अच्छी बात है अपने अपने घर हैं लेकिन अभी बच्चो की कमी की वजह से घरों में रौनक नही है घर खाली उदासी पैदा करते हैं हमे अधिक बच्चो को जन्म देना चाहिए अभी तो कोई गरीब नही है इस जमाने में पैसे वाला वास्तव में गरीब है अधिक बच्चो वाला गरीब अनपढ़ बेरोजगार असली अमीर है क्यों की उस के पास live future है,


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